ये आंसू भी अब पलकों पे आते नही हैं देखो ना अब लोग मुझे तुम्हारे नाम से सताते नहीं हैं अब नही होता कोई दिन हसीन अब कोई पक्षी मेरे द्वार पर आ कर गाते नहीं हैं रात में बाहर ही रहता हूं अब मैं क्योंकि नींद लेने से डरने लगा हूं क्योंकि ये नींद के वक्त के सपने इन सपनों में भी हम साथ नजर अब आते नहीं हैं जो तुझे झुमके दिए थे मैंने कभी सुना है वैसे झुमके अब वो बनाते नही हैं महफिलों में बदनाम हो गया है अब हमारा नाम क्योंकि शराब पीके भी अब हम शायरी किसीको सुनाते नही हैं आज अनजाने में तेरे घर के सामने से निकलना हुआ देखा के जो फूल तू अपने बालों में लगाता था वो फूल भी अब तेरे बगीचे में नजर आते नही हैं तुझपे तो आज भी मेला लगा होगा ना लोगो का एक हम ही हैं जो किसीको पसंद आते नही हैं। ~Akrit
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