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Showing posts from October, 2021

तेरा जाना।

तेरा जाना कोई इत्तेफ़ाक तो ना था हमारा यूं मिलना कोई ख़्वाब तो ना था, जाना तेरा दर्दों का महल था कोई हसीन बाग तो ना था, याद तो बहुत आएं तुम हमे पर इन यादों में तू हमारे साथ तो ना था, मान जाते हम भी के मुकम्मल नहीं तो क्या हुआ प्यार हमारा भी सच्चा था, लेकिन हमारे जाने के बाद भी तू अकेला कोई शाम तो ना था, सब कहते रहें की ख़तम कर सही नहीं है ये पर हमने किसी की एक ना सुनी अंत में सच हुई सब बातें के मानो साबित करना चाहता था तू, के तेरे मुंह से निकला हर बोल बस एक बोल था सच की कोई किताब तो ना था, प्यार मेरा सच्चा था हर मुलाक़ात में हर एहसास में इश्क़ मेरा पक्का था, पर आज एक बात सच तू भी बोल दे के हर मुलाक़ात में रातों की लम्बी बात में तू मेरे साथ था पर मेरे पास तो ना था, बर्बादी के अंत पर आ चुके है अब रोज़ पूछते है खुद से के ऐसे जीवन निकालने का मेरा कोई ख्वाब तो ना था, किसी रोज़ आके देख कर जाना मेरी हालत फिर पूछना एक बार खुद से कहीं ये खिलोना कोई इंसान तो ना था। ~Akrit मेरी किताब/My Book. My Social/Work