Skip to main content

हम सबके प्रिय कवि दुष्यंत कुमार जी।

                                         

                                                           Photo Source-duniyahaigol.com

दुष्यंत कुमार (1933-1975) हिंदी जगत के महान कवियों में से एक हैं, जब भी कविता या ग़ज़ल का ज़िक्र होता है तो इनका नाम ज़रूर आता है कई बड़े कवि और नेता इनकी कविताएं ग़ज़लें कवि सम्मेलन, सभाओं मै सुनाते रहते हैं, हर लेखक इन्हे अपने जीवन का प्रेरणा स्त्रोत मानता हैं, ये कवि होने के साथ साथ कथाकार और गज़लकार भी थे इनकी लिखी हुई कई कविताएं ग़ज़लें आज के सिनेमा और गानों मै कई बार इस्तेमाल की जा चुकी हैं, आज इस महापुरुष की कुछ लेख हम आपके समक्ष रखने की कोशिश करेंगे, चलिए साथ मिलकर आज दुष्यंत कुमार जी के काम कि सराहना करते हुए उनको याद करते है।







1.) केसे मंज़र सामने आने लगे हैं।


केसे मंज़र सामने आने लगे हैं

गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं,


अब तो इस तालाब का पानी बदल दो

ये कमल के फूल कुम्हलाने लगे हैं,


वो सलीबो के क़रीब आए तो हम को

काएदे कानून समझाने लगे हैं,


एक कब्रिस्तान में घर मिल रहा है

जिसमे तेहखानो से तेहखाने लगे हैं,


मछलियों में खलबली है अब सफ़ीने

इस तरफ़ जाने से कतराने लगे हैं,


मौलवी से डांट खा कर  अहले-मक़तब

फिर उसी आयात को दोहराने लगे हैं,


अब नई तहजीब के पेशे - नज़र हम

आदमी को भून कर खाने लगे हैं।


-Dushyant Kumar ji




 2.)आज वीरान अपना घर देखा।


आज वीरान अपना घर देखा

तो कई बार झांक कर देखा,


पांव टूटे हुए नज़र आए 

एक ठहरा हुआ खंडर देखा,


रास्ता काट कर गई बिल्ली

प्यार से रास्ता अगर देखा,


नालियों में हयात देखी हैं

गालियों मै बड़ा असर देखा,


उस परिंदे को चोट आई तो

आपने एक - एक पर देखा,


हम खड़े थे कि ये ज़मीं होगी

चल पड़ी तो इधर - उधर देखा।


-Dushyant Kumar ji




3.) कहां तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिए।


कहां तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिए

कहां चराग़ाँ मयस्सर नहीं शहर के लिए,


यहां दरख़्तों के साए में धूप लगती हैं

चलों यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए,


न हो कमीज़ तो पांव से पेट ढकलेंगे

ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए,


ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही

कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए,


वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता

मैं बेकरार हूं आवाज़ में असर के लिए,


तेरा निज़ाम है सिल दे ज़बान - ए - शायर को

ये ऐहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए,


जिएं तो अपने बगीचे मै गुल - मुहर के तले

मरें तो गैर की गलियों में गुल - मुहर के लिए।


-Dushyant Kumar ji



4.)हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए।


हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए,


आज ये दीवार पर्दो की तरह हिलने लगी

शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए,


हर सड़क पर हर गली मै हर नगर हर गांव में 

हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए,


सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए,


मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही 

हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।


-Dushyant Kumar ji


5.)मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूं।



मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूं

वो ग़ज़ल आपको सुनता हूं,


एक जंगल है तेरी आंखो में

मैं जहां राह भूल जाता हूं,


तू किसी रेल सी गुज़रती है

मैं किसी पुल सा थरथराता हूं,


हर तरफ़ ऐतराज़ होता है 

मैं अगर रोशनी में आता हूं,


एक बाजू उखड़ गया जब से

और ज्यादा वजन उठाता हूं,


मैं तुझे भूलने की कोशिश में

आज कितने क़रीब पाता हूं,


कौन ये फ़ास्ला निभाएगा

मैं फरिश्ता हूं सच बताता हूं।


-Dushyant Kumar ji



उम्मीद करता हूं आपको मेरी यह कोशिश पसंद आई अगर पसंद आए तो कमेंट करके ज़रूर बताएं और ब्लॉग को शेयर करे, धन्यवाद।

My social handles.



Comments

Popular posts from this blog

मैं कलम हूं।

 मैं कलम हूं लिखता जाऊंगा दिल की हर बात को लफ़्ज़ों में पीरोता जाऊंगा हर याद को हर बात को दिल के अंदर दफन हो चुके उस हर राज को मैैं पन्नों पे बिखेरता जाऊंगा मैं कलम हूं लिखता जाऊंगा, हा लिखूंगा उसके बारे में भी जिसने तुम्हे लिखना सिखाया है, लिखूंगा उसकी खूबसूरती के बारे में जिसे देख तू आज भी पागल हो जाता है लिखूंगा  उसके हर अंदाज़ - अदह के बारे में जो आज भी तुझे मदहोश करते है उसके प्यार के बारे में उसके इकरार के बारे में उसके जाने के बाद के गम के बारे में, उसके साथ होने की खुशी से लेके उसके ना होने के गम तक मैं तेरे साथ चलता जाऊंगा मैं कलम हूं लिखता जाऊंगा, लिखूंगा मैं तेरी ख्वाहिशों के बारे में जो तुने सिर्फ मुझे बताई है लिखूंगा मैं उन सपनों के बारे में जो तेरी ये आंखे रोज़ देखती है लिखूंगा उस खुशी के बारे में जो तू अपने माता - पिता के चेहरे पर देखना चाहता है लिखूंगा तेरी उन बचपन की यादों के बारे में जिन्हें याद करके आज भी तेरी आंखे भर आती है लिखूंगा तेरे यारों के बारे में जिन्हें तू कभी खुद बोल नहीं पाया और ना शायद बोल पाएगा की वो तेरे जीवन में उतने ही जरूरी है जितना जि...

इंसान की इंसानियत।

देश गुजर रहा है इस वक़्त काफी मुश्किल घड़ी से , ये दिख गया है लोगो की बातों में,  ऐसा समय है चल रहा, जो नहीं है किसी सरकार के हांथों में, तभी डरे डरे से सहमे - सहमे से लोग रहते है आजकल दिन और रातों में, ये वक़्त मांगता है सबका साथ, तभी जीत पाएगा देश इस बार, पर पता नहीं क्या चल रहा है आजकल लोगों के विचारो में,  कोई कर रहा है राजनीति ,तो कोई कोस रहा है सरकार को कोई अपनी गलती मान ने से कर रहा है इंकार ,तो कोई गलत बातें सिखा रहा है लोगों को पढ़ के अखबार ,ये सब देख कर सोच में पड़ जाते है ,कि पता नहीं कोनसी गलत चीज़े इंसान सीख - पढ़ रहा है किताबो मै, इंसान इंसानियत ही भूल गया है ,मानो इस देश की संस्कृति को छोड़ वो कोषों दूर गया है, ये कैसा स्वभाव बना रहा है इंसान, कि मानो वो रहना भूल गया हो संस्कारो में, आज के समय का दृश्य देख कर एक बात बोलना चाहूंगा मै, कि सुना है इंसानियत बिच रही है आजकल बाजारों में, लोग तो बस नफ़रत ही छपवा रहे है इश्तहारों में, अख़बारों में समाचारों में एक दूसरे के विचारो में, अंजानों में या यारो में लोग तो बस नफ़रत छपवा रहे है इश्तहारों में, इस वक़्त की गंभीरता ...